रविवार, 29 जून 2008
मेरा विचार
समाज के बदलते रंग ढंग ने हमारी जीवन शैली बदल दी है। सामाजिक संबंध की गरिमा खत्म होती जा रही है। परम्पराओ के बंधन में बंधा संबंध हमें बंधन लगने लगा है। खुलकर मिलना , खुलकर बातचीत करना , छोटे - बड़े के अहसास से दूर , हर संबंध को दोस्ती का नाम देकर संबंधों की गरिमा को नजर अंदाज करना आज के लोगों का बनता जा रहा है। उन्हें समझ नहीं आ रहा की उनका यह फैशन हमारी पारिवारिक परम्परा को एक नाग की तरह डसता जा रहा है । हमारे पुरखों ने बड़ी मेहनत से संबंधों की एक श्रृखला बनाई थी , जिसे चरित्र की मर्यादा से सीचा है। आज के लोग आधुनिकता के नाम पर संबंधों की इस श्रृंखला को तहस नहस किए जा रहे हैं । परंपराओं का यह सर्वनाश हमारे जीवन शैली का सर्वनाश है। समय रहते हमें सचेत होना होगा, वरना हमारी मर्यादा, हमारी परम्परा सभी मिट जायेगी और हमारे नवनिहाल हमारे पुरखों के गौरवमयी आदर्श को जीने से वंचित रह जायगा।
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